|
कर्नाटक के ‘गुरुकुल’
शिक्षा के क्षेत्र में एक अनोखा प्रयोग कर्नाटक में लगभग दस (10) वर्षों से चलाया जा रहा है। भारतीय आध्यात्मिक मूलाधारित, भावनिक, देशभक्ति जगानेवाली तथा सामाजिक रचना सुदृढ करनेवाली अपनी शास्त्रशुद्ध प्राचीन शिक्षा प्रणाली के माध्यम से छात्र का व्यक्तित्व विकसित किया जाता था। अपनी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था इतनी स्वस्थ तथा सक्षम नहीं है। आज कल छात्रों को हर पादान एवं हर एक शिक्षा शाखा में जानलेवा स्पर्धा का सामना करना पड़ता है। फलस्वरूप आझकल की परीक्षा पद्धति अनेक दोषों को जन्म देती है। जैसे परीक्षा-ज्वर (Examination fever), ईर्ष्या, अहंभाव, स्वार्थ, दुराचार इत्यादि। शिक्षा क्षेत्र में शासकीय हस्तक्षेप होने के कारण छात्र, अभिभावक, शिक्षक आदि के सम्मुख नित्य नई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। प्रचलित परीक्षा पद्धति को गुरुकुलों में कोई स्थान नहीं है। इसी प्रकार से केवल शासकीय पाठ्यक्रम, पुस्तकें, एवं समयबद्ध शिक्षा की कक्षाएँ, आदि से भी गुरुकुल मुक्त हैं। गुरुकुलों के पाठ्यक्रम वेद, विज्ञान, योग, कृषि तथा कलाएँ आदि भारतीय मूलाधार पर रचित हैं। इसे मंचामुखी शिक्षा कहते हैं। अपने इस प्रयोग में निम्नलिखित पाँच शोध क्षेत्र चुने गए हैं। (1) क्षमता-आधारित शिक्षादान तथा शिक्षा ग्रहण करने की विधि। (2) ‘योग’ मानसशास्त्र (3) उपनिषदों में वर्णित शिक्षा पद्धति (4) भारतीय विज्ञान एवं (5) अपना सांस्कृतिक इतिहास। ऐसे शोधक्षेत्रों पर आधारित अध्यापक के प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम विकसित किया गया है। यहाँ के अध्यापक भिन्न-भिन्न प्रकार के शोध/अध्ययन प्रकल्प चलाते हैं जो ऊपर निर्देशित सूत्रों से संबद्ध हैं। वर्तमान समय कर्नाटक में तीन(3) गुरुकुल संचालित किए जाते हैं। ‘मैत्रेयी’ गुरुकुल में दस(10) वर्ष की बालिकाओं को प्रवेश दिया जाता है। यह दक्षिण कॉनरा जिले के विट्ठल(Vittal) गाँव के निकट एक ग्राम में है। यहाँ इस वर्ष 94 बालिकाएँ शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। 13 माताश्रीयों ने (Lady Teachers) शिक्षा का दायित्व सम्हाला है। ‘प्रबोधिनी’ नाम का दूसरा गुरुकुल बालकों के लिए चलाया जाता है। आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित श्रृंगेरी मठ से थोड़ी दूरी पर हरिहरपुरा गाँव में ‘तुंगा’ नदी के तट पर स्थित इस गुरुकुल में 90 छात्र एवं 12 आचार्य हैं। यहाँ भी 10 वर्ष के बालकों को प्रवेश दिया जाता है। ‘वेद विज्ञान गुरुकुल’ नाम के तीसरे गुरुकुल में दसवीं कक्षा या इससे अधिक शिक्षित छात्रों को प्रवेश दिया जाता है। बेंगलोर के निकट, ‘चन्नेनहक्की’ में स्थित इस गुरुकुल में वर्तमान 35 छात्र 6 आचार्यों के मार्गदर्शन में वेदाध्ययन एवं संबंधित विषयों में शोध कार्य करते हैं। साथ-साथ श्रीमद् भगवद् गीता, उपनिषद, ब्रह्मसूत्र, योगसूत्र आदि का भी अध्ययन-अध्यापन होता है। बाहर से कई अध्यापक यहाँ आकर आधुनिक विषय जैसे संगणक, अंग्रेजी भाषा आदि पढ़ाते हैं। शिक्षा का माध्यम संस्कृत है। सभी गुरुकुलों में 6 वर्ष का पाठ्यक्रम रहता है। सभी गुरुकुलों में निवास, भोजन, किताबें, वैद्यकीय उपचार आदि व्यवस्था निःशुल्त है। शिक्षा कालावधि के अंत में छात्र की शैक्षिक गुणवत्ता एवं पात्रता उसके अध्यापन की गुणवत्ता एवं पात्रता के आधार पर नापी जाती है। ‘आचार्यत्त्व’ छात्र का जीवनव्रत बन जाए यही तीनों गुरुकुलों का प्रयास रहता है। आचार्य तथा छात्र सांस्कृतिक प्रतिनिधि (Cultural Ambassdor) के नाते अपना जीवन व्यतीत करें यह अपेक्षा रहती है। यह सुखद अनुभव है कि प्राक्तन छात्र शालांत परीक्षा दें तो वे प्रथम या विशेष श्रेणी में उत्तीर्ण हो जाते हैं। अधिकांश प्राक्तन छात्र सांस्कृतिक प्रतिनिधि की भूमिका (Role) निभा रहे हैं, यह भी संतोष की बात है।
|